एक खिलाड़ी के संघर्ष और ज्वलंत मुद्दों को दर्शाती है ‘मुक्काबाज’ !

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दादरी हत्याकांड, गाय के नाम पर गुंडागर्दी जैसे कई मुद्दों को हल्के-फुल्के अंदाज में बया करने वाली फिल्म ‘मुक्काबाज’ गुरुवार को रिलीज हो गयी. जो ये साफ तौर पर दर्शाती है कि आप ‘भारत माता की जय’ बोलकर किसी की भी धुनाई कर सकते हैं. फिल्म में ऐसे ही कई ज्वलंत मुद्दों को बड़े ही बारीकी से निर्देशक अनुराग कश्यप ने दिखा दिया है. फिल्म की पूरी कहानी एक ऐसे मुक्केबाज खिलाड़ी के संघर्ष पर आधारित है. अन्य मुख्य कलाकारों के अलावा फिल्म के एक गाने में नवाजुद्दीन सिद्दीकी भी हैं.

अब बात फिल्म की करे … तो इस बार अनुराग ऐसी फिल्म लेकर आए हैं जो दिखाती है कि खेल में राजनीति किस कदर हावी है. अगर राजनीति ना होती तो आज खिलाड़ियों के हालात कुछ और होते. एक खिलाड़ी जो बॉक्सिंग के हर दांव पेच में माहिर है, वो जब अपना हक पाने के लिए एक राजनेता से पंगे ले लेता है तो उसे किन-किन मुश्किल हालात से गुजरना पड़ता है. ये फिल्म यूपी के बरेली और बनारस के ईर्द-गिर्द बनी है. फिल्म दिखाती है कि जिला स्तर, राज्य स्तर और यहां तक राष्ट्रीय स्तर पर खेलों में राजनीति इतनी हावी है कि अगर कोई उस दलदल में फंस गया तो निकलना नामुमकिन है.

क्या कहती है कहानी ?

यूपी के बरेली में रहने वाले श्रवण कुमार (विनीत सिंह) का पढ़ाई में भले ही मन ना लगा हो लेकिन वो बॉक्सर बनना चाहते हैं. श्रवण का सपना है कि वो यूपी का माइक टायसन बनें. इसके लिए वो स्थानीय नेता भगवान दास मिश्रा (जिमी शेरगिल) के यहां जाते हैं जो कोच भी है, जो बॉक्सरों से गेहूं पिसवाने से लेकर खाना बनवाले तक अपने हर पर्सनल काम ज्यादा कराता है.

यहां भगवान दास की भतीजी सुनैना (ज़ोया हुसैन) के श्रवण दीवाने हो जाते है. और वो भगवान दास से बगावत कर बैठता है. राष्ट्रीय स्तर पर खेलने के लिए उसे बनारस जाना पड़ता है जहां उसके कोच संजय कुमार (रवि किशन) ट्रेनिंग देते हैं. लेकिन मगरमच्छ पानी से बैर करके कहां जाएगा. इसके बाद उसे अपना सपना पूरा करने के लिए क्या-क्या दिन देखने पड़ते हैं, यही पूरी कहानी है.

फिल्म में ये भी दिखाया गया है कि स्पोर्ट्स कोटे से जॉब मिलने के बाद भी खिलाड़ियों की राह आसान नहीं होती है. सरकारी दफ्तरों में उन्हें फाइल उठाने से लेकर चपरासी तक के काम करने को मजबूर होना पड़ता है. जहां खेल का मंच है वहां नेताओं के घर की शादियों का आयोजन होता है. ऐसे बहुत सारे मुद्दों को हल्के-हल्के छूकर ये फिल्म निकल गई है.
हालही में सलमान और अमीर खान के किरदार में पहलवानी यानी रेसलिंग खेल पर बनी फिल्म ‘सुल्तान’ और दंगल से लेकर ‘एम. एस. धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी’, सचिन ए बिलियन ड्रीम मैरी कॉम तक बॉलीवुड में खेल पर बहुत सारी फिल्में बन चुकी हैं. लेकिन उन सभी फिल्मों से ये फिल्म अलग है क्योंकि इसमें कोई सुपरस्टार नहीं है. इसमें ‘मुक्काबाज’ श्रवण कुमार की भूमिका में विनीत सिंह हैं.

बॉक्सर श्रवण कुमार की भूमिका में विनीत सिंह ने कमाल कर दिया है. पर्दे पर उन्हें देखते समय लगता नहीं कि वो एक्टिंग कर रहे हैं. बॉक्सिंग उनके रग-रग में दिखाई देता है. लैंग्वेज में यूपी का लहजा लाना भी इतना आसान नहीं है लेकिन वो उसे भी बखूबी कर गए हैं.

लीड एक्टर के रूप में ये विनीत की पहली फिल्म है. इस मुद्दे पर फिल्म बनाने का आइडिया भी विनीत का ही था जिन्होंने इस फिल्म की स्क्रिप्ट भी लिखी है. 2013 से ही विनीत इस फिल्म के लिए प्रोड्यूसर ढ़ूढ रहे थे. उनकी शर्त ये थी कि जब भी फिल्म बनेगी लीड भूमिका वही निभाएंगे. अनुराग कश्यप तो वैसे भी स्टार एक्टर्स को लेकर फिल्में नहीं बनाते. उनकी खासियत ही है कि वो एक्टर कहानी और स्क्रिप्ट पर ही पूरा फोकस करते हैं. विनीत का जुनून इस फिल्म में भी दिखाई देता है. ज़ोया हुसैन इस फिल्म से डेब्यू कर रही हैं वो इस फिल्म में ऐसी लड़की की भूमिका में हैं जो सुन सकती है लेकिन बोल नहीं सकती. उन्होंने भी इसको बहुत ही मजबूती से निभाया है.

 

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