जीतेंद्र : 25 रीटेक वाला हीरो

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ये वी. शांताराम की पारखी नज़र का ही कमाल था कि उन्होने स्टूडियो-दर -स्टूडियो नकली जेवरों की सप्लाई करने वाले रवि कपूर नामक एक लड़के को हिंदी सिनेमा का जम्पिंग जैक बना दिया ..लेकिन नकली जेवर बेचने वाले जीतेन्द्र को असली अभिनेता बनाने के लिए वी शांताराम को भी कुछ कम पापड नहीं बेलने पड़े..अपनी पहली फिल्म में एक डायलॉग को सही तरीके से बोलने के लिए जीतेन्द्र ने इतने रीटेक किये कि शांताराम जैसे शांत स्वभाव वाले निर्देशक भी अपना धीरज खो बैठे ..25 रीटेक के बाद भी जब जीतेंद्र सही डायलॉग नहीं बोल पाए तो अंत में हार कर शांता राम ने गलत डायलॉग को ही ओके कर दिया ..
जीतेन्द्र के पिता ज्वेलरी के व्यवसाय के अलावा फिल्मों में प्रयुक्त होनेवाले नकली जेवरों की सप्लाई भी किया करते थे… इसी सिलसिले में जीतेन्द्र विभिन्न स्टूडियोज़ के चक्कर लगाया करते थे… यहीं से उन्हें फिल्मों में काम करने का चस्का लगा.. एक दिन वे फिल्मालय पहुंचे, जहाँ वी. शांताराम की फिल्म ‘नवरंग’ की शूटिंग चल रही थी.. शांताराम की नज़र जब जीतेन्द्र पर पड़ी, तो उन्होंने जीतेन्द्र से उनकी पढ़ाई के बारे में पूछ-ताछ की… बातचीत के दौरान जीतेन्द्र ने शांताराम से फिल्मों में काम करने की अपनी इच्छा को ज़ाहिर किया.. शांताराम जीतेन्द्र के पिता के मित्र थे, इसलिए ना कहकर उन्हें नाराज़ नहीं करना चाहते थे ..उनकी इच्छा को देखते हुए शांताराम ने उन्हें नवरंग में हीरोइन संध्या के साथ एक छोटी सी भूमिका दे दी .

इस फिल्म की शूटिंग के दौरान जीतेंद्र को अभिनेता उल्हास के सामने एक डायलॉग बोलना था .. डायलॉग था -“सरदार !सरदार !दुश्मन टिड्डियों के दल की तरह बढ़ता ही आ रहा है ..”जीतेंद्र जब कैमरे के सामने आये तो बुरी तरह नर्वस हो गए और हकलाने लगे ..अभिनेता उल्हास और वी शांताराम की हौसला -आफजाई पर उन्होने डायलॉग तो बोला मगर टिड्डियों को कभी किड्डीयाँ तो कभी फिड्डीयाँ ही कहते रहे ..बार बार रीटेक होते देख जीतेंद्र और भी नर्वस हो गए ..इधर वी शांताराम को कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि क्या करें ..उन्होने बहूत कोशिश की मगर जीतेंद्र गलत ही बोलते रहे ..शांताराम ने डांटा तो वे रोने लगे .

शांताराम समझ गए कि इसे समझाना बेकार है ..इसलिए 25 रीटेक के बाद भी जब जीतेंद्र ने टिड्डियों को फिद्दियों कहा तो शांताराम ने इस गलत शब्द को ही ओ के कर दिया ..इसे शांताराम की मेहरबानी ही कहेंगे कि इसके बाद भी उन्होने जीतेंद्र को अपनी फिल्म सेहरा में मौका दिया ..1964 में उन्होने जीतेंद्र को लेकर “गीत गाया पत्थरों ने “जैसी सुपर हिट फिल्म बनाई और इसके साथ ही जीतेंद्र बतौर अभिनेता स्थापित हो गए .

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