Madhubala:तेरी सूरत से मिलती नहीं किसी की सूरत….

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मधुबाला की खूबसूरती की मिसाल अगर फूलों से दी जाती है तो, फूलों के सीने में पैबस्त काँटों का फलसफा भी उनकी जिंदगी के बारे में उतना ही सच है. सिनेमा के सुनहरे पर्दे पर मधुबाला की दिलकश अदाएं दर्शकों को सौंदर्य की एक अलग ही दुनिया में ले जाती है. पर उनके पीछे दर्द और जख्मों का एक सैलाब भी छुपा था, जिन तक पहुंचने का रास्ता उनकी बोलती बतियाती मोहक मुस्कान और खूबसूरत आंखों से होकर गुजरता था. मधुबाला सचमुच ऐसी ही थी जिसे देखकर कोई भी आशिक शाहजहां होने का ख्वाब पाल लेता, लेकिन मधुबाला बनने से पूर्व मुमताज रही इस बाला के मुकद्दर में कोई ताजमहल था ही नहीं. कुछ था तो केवल क्रूर पिता का साया, प्रेमियों की रुसवाई और जानलेवा दिल की बीमारी.

11 वर्ष की छोटी सी उम्र में मधुबाला ने अपने भारी-भरकम कुनबे का बोझ उठाने के लिए बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट बॉम्बे टॉकीज की फिल्म ‘बसंत’ से सिनेजगत में कदम रखा. 1947 में पहली बार निर्देशक केदार शर्मा ने उन्हें अपनी फिल्म ‘नीलकमल’ में बतौर हीरोइन ब्रेक दिया. इस फिल्म एम् उनके हीरो राजकपूर थे, जो खुद इस फिल्म के द्वारा अपने फ़िल्मी करियर का आगाज कर रहे थे. फिल्म तो ज्यादा नहीं चली लेकिन वो निर्माता-निर्देशक की नज़रों में ज़रूर आ गई. मोहन सिन्हा जो उन दिनों इंडस्ट्री के बड़े फिल्मकारों में से थे, उन्होंने मधुबाला को अपनी चार फिल्मों ‘चितौड़ विजय’, ‘दिल की रानी’, ‘खूबसूरत दुनिया’ और ‘मेरे भगवान’ के लिए एक साथ साइन किया. चारों फ़िल्में एक के बाद एक रिलीज हुई लेकिन सभी असफल रही. इस दरम्यान उन्होंने लगभग सभी छोटी-बड़ी 24 फिल्मों में काम किया. लेकिन मधुबाला कोई खास पहचान नहीं बना पायी.

मधुबाला की कामयाबी का सफर साल 1949 में कमाल अमरोही की फिल्म ‘महल’ से शुरू हुआ. इस फिल्म में मधुबाला के जोड़ीदार उनसे 20 साल बड़े अभिनेता अशोक कुमार थे. फिर भी ताजातरीन कथानक और मधुर गीत-संगीत के कारण फिल्म को दर्शकों ने खूब पसंद किया. इसके बाद आई ‘बादल’ और ‘बेकसूर’ जैसी फ़िल्में भी सफल रही. ‘तराना’, ‘संगदिल’, ‘मिस्टर एंड मिसेज 55’, ‘हावड़ा ब्रिज’, ‘कालापानी’, ‘फागुन’ तथा ‘चलती का नाम गाड़ी’ उनकी अन्य उल्लेखनीय फ़िल्में रही. लेकिन 1960 में प्रदर्शित के. आसिफ की फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ ने उनकी शोहरत को शिखर पर पहुंचा दिया. हिंदी सिनेमा के इस महाकाव्य में मधुबाला के अभिनय और सौंदर्य का सर्वश्रेष्ठ रूप सामने आया और फिल्म के साथ मधुबाला का नाम भी सिनेमा इतिहास के सुनहरे पन्नों में दर्ज हो गया.

फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ ने मधुबाला के करियर को उस मुकाम पर पहुंचा दिया जहां पहुँचने की ख्वाहिश हर कलाकार की होती है, लेकिन उनकी निजी जिंदगी यहीं से ढ़लान की ओर बढ़ गई. दिलीप कुमार के साथ संबंधों का टूटना, लाइलाज होती जा रही दिल की बीमारी और किशोर कुमार के साथ हुई शादी की असफलता ने उनकी ज़िंदगी को अँधेरे से भर दिया और अंततः 23 फरवरी, 1969 को मात्र 36 वर्ष की छोटी सी उम्र में वो इस दुनिया को अलविदा कह गयी.

एक कलाकार के तौर पर मधुबाला की अभिनय शैली में टीका-टिपण्णी की गुंजाईश हो सकती है, लेकिन उनके स्वर्गीय सौंदर्य के अलावा उनके व्यक्तित्व में भी कुछ ऐसी कशिश ज़रूर थी, जिसके कारण हिंदी सिनेमा अब तक उनकी दूसरी मिसाल नहीं ढूंढ पाया.

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